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Saturday, 9 April 2011

फिल्म समीक्षा : ‘थैंक यू’

निर्माता : रॉनी स्क्रूवाला, ट्विंकल खन्ना
निर्देशक : अनीस बज्मी
संगीत : प्रीतम चक्रवर्ती
कलाकार : अक्षय कुमार, सोनम कपूर, बॉबी देओल, सेलिना जेटली, इरफान खान, रिमी सेन, सुनील शेट्ट
मेहमान कलाकार - मल्लिका शेरावत / विद्या बालन
सेंसर सर्टिफिकेट : यू/ए*
2 घंटे 20 मिनट

पति-पत्नी के रिश्ते में हास्य की बहुत गुंजाइश रहती है शायद इसीलिए सबसे ज्यादा जोक्स पति-पत्नी की नोकझोक पर आधारित रहते हैं। कई गंभीर और हास्य फिल्में भी इसी रिश्ते पर बन चुकी हैं। नो एंट्री के बाद अनीस बज्मी ने एक बार फिर इस विषय पर कॉमेडी फिल्म थैंक यूबनाई है जो नो एंट्री का ही विस्तार लगती है। इसमें भी लंपट पति हैं जो अपनी खूबसूरत पत्नी होने के बावजूद बाहर मुँह मारने से बाज नहीं आते हैं। वे मर्द हैं। दो-चार अफेयर तो उनकी पत्नी माफ कर ही सकती हैंऐसा उनका मानना है। बीवियाँ बेहद सीधी-सादी हैं। पति का अफेयर चल रहा हैये पता चलने के बावजूद वे करवा चौथ का व्रत करती हैं। तीन दोस्तों में से एक की बीवी को अपने ‍पति पर शक होता है और पति को रंगे हाथ पकड़ने का जिम्मा एक जासूस को देती है। जब पतियों के कारनामे पत्नियों तक पहुँचने लगते हैं तो वे (पति) उस आदमी को पकड़ने का जिम्मा उसी जासूस को देते हैं जो उनकी पत्नियों के लिए काम कर रहा है।
यही बात फिल्म को मजेदार बनाती हैं और हास्य की बहुत सारी गुंजाइश पैदा होती हैं। लेकिन इसका पूरी तरह दोहन अनीस बज्मी और उनके लेखक नहीं कर पाए। नि:संदेह स्क्रीनप्ले में कई हास्य और मनोरंजक सीन हैंलेकिन इसमें पूरी तरह सफाई नहीं है। फिल्म देखते समय दर्शक हँसता जरूर है, लेकिन लॉजिक के बारे में सोचने पर उसे थोड़ी निराशा हाथ लगती है। लेखन में फिनिशिंग टच की आवश्यकता महसूस होती है। अनीस द्वारा निर्देशित फिल्में तेज गति से भागती हैं। थैंक यू’ का पहला हाफ बेहद मनोरंजक और उम्दा हैलेकिन दूसरे हाफ में फिल्म में नीरस क्षणों का प्रतिशत ज्यादा है। खासतौर पर फिल्म का क्लाइमैक्स कमजोर है और जल्दबाजी में निपटाया गया है। मुकेश तिवारी और अक्षय-विद्या वाले ट्रेक कमजोर और ठूँसे हुए लगते हैं। अनीस ने फिल्म की कन्टीन्यूटी पर भी ध्यान नहीं दिया है और कलाकारों की ड्रेसेस बदली हुई नजर आती हैं। थैंक यू तो फिल्म के कलाकारों को कहा जाना चाहिए जिन्होंने स्क्रिप्ट की कमियों को अपने बेहतरीन अभिनय से ढँक लिया और मनोरंजन के स्तर को बनाए रखा। अक्षय कुमार का अभिनय उम्दा है और वे लाउड नहीं हुए हैं। हालाँकि उनके प्रशंसक उनका रोल देख निराशा महसूस कर सकते हैं क्योंकि उन्हें और अन्य कलाकारों को बराबरी के फुटेज मिले हैं। यह देखना दिलचस्प था कि अनीस की मसालेदार फिल्म में इरफान खान कैसा काम करते हैं और कहना होगा कि इरफान एक बार फिर सब पर भारी पड़े हैं। उनके और रिमी सेन के दृश्य मजेदार हैं। बहुत दिनों बाद सुनील शेट्टी ने याद रखने लायक अभिनय किया है। बॉबी देओल ठीक हैं। हीरोइनों में रिमी सेन का अभिनय अच्छा है, लेकिन काम कम होने से उनके शरीर पर चर्बी जमा हो गई है।
         सोनम कपूर का मेकअप खराब था और अभिनय औसत। सेलिना जेटली शुरुआत के चंद दृश्यों के बाद क्लाइमैक्स में नजर आती हैं। मल्लिका शेरावत पर एक गाना फिल्माया गया हैजो उतना हॉट नहीं बन पाया है जैसी कि उम्मीद की गई थी। संगीतकार प्रीतम काम के मामले में ओवरलोड हो रहे हैंलेकिन वे ये अच्छी तरह जानते हैं कि किस निर्देशक को किस तरह की धुन टिकाना है। अनीस को उन्होंने रिजेक्टेड धुनें थमा दी हैं। पुराने गाने का नया वर्जन प्यार दो प्यार लोही याद रहता है। कनाडा के लोकशन्स शानदार तरीके से फिल्माए गए हैं और फिल्म पर अच्छा पैसा खर्च किया गया है। थैंक यू’ देखते समय ज्यादा दिमाग पर जोर नहीं दिया जाए तो यह एक अच्छा टाइम पास है।

Wednesday, 6 April 2011

जाट की भैंस (Jat ki Bhains)

एक जाट की भैंस गुम हो गई. अपने छोरे नै साथ लेकै जाट नै आसपास हर तरफ ढूंढ ली पर भाई भैंस ना मिली. थक हार कै दोनों बापू बेटे रास्ते में आए हनुमान मंदिर में जाके भैंस मिलाने की प्रार्थना करन लगे. प्रार्थना समाप्त कर जाट जोर से हनुमान जी से बोला के "हनुमान जी जे आज सवेरे तक भैंस मिलगी तो एक थन आपका. उसका दूध आपकै ही चढ़ेगा."
थोड़ी आगे चले तो देवी मंदिर आग्या. दोनों देवीमंदिर में जाके भैंस मिलाने की प्रार्थना करन लगे. प्रार्थना समाप्त कर जाट जोर से देवी भगवती से बोला के "दुर्गा माता जे आज सवेरे तक भैंस मिलगी तो एक थन आपका उसका दूध आपकै ही चढ़ेगा."
थोड़ी और आगे चले तो भैंरों मंदिर आग्या. दोनों मंदिर में जाके भैंस मिला ने की प्रार्थना करने लगे. प्रार्थना समाप्त कर जाट जोर से भैंरों बाबा से बोला के "हे बाबा जे आज सवेरे तक भैंस मिलगी तो एक थन आपका उसका दूध आपकै ही चढ़ेगा."
फेर थोड़ी और आगे चले तो ग्रामदेवता का मंदिर आग्या. दोनों मंदिर में जाके भैंस मिलाने की प्रार्थना करने लगे. प्रार्थना समाप्त कर जाट जोर से बोला के "हे ग्राम देवता जे आज सवेरे तक भैंस मिलगी तो एक थन आपका. उसका दूध आपकै ही चढ़ेगा."
यह सुनते ही उसके साथ खड़ा जाट का छोरा बोल्या बापू तनै तो चारों थन देवी-देवताऒं में बांट दिये अब अगर भैंस मिल भी गई ते क्या फायदा ?
हम कौन से थन का दूध पीवेंगें ???
जाट बोल्या रै छोरे मैं जाट सूं. तनै के समझ राख्या है....
एक बार भैंस मिल जाण दे इन देवी-देवताऒं नै तो मैं आप देख ल्यूंगा !!!

Monday, 28 February 2011

किसानों के लिए दादा लाए थोड़ी खुशियाँ, थोड़े....


हिंदी पत्रकारिता विभाग के छात्रों द्वारा आम बजट, २०११ पर एक विशेषांक निकला गया था. जिसमें कृषि बजट के पन्ने पर मेरा यह लेख प्रकाशित हुआ था........


दहशतगर्दी बनाम आतंकवाद

Difference between 'Terrorism' and 'Insurgency' !!
      सामान्य लोग उपयोगी काम करने के एवज में अपने हक हासिल कर सुकून से जीने की नीयत रखते हैं। किसके लिए, क्या करके, क्या लेना तथा किसकों क्या देना है यह सब व्यवहारों से समझ आ जाता है। इसी न्याय विवेक से मान-अपमान की भावना और आचरण चरित्र बनता है। जीवन की इसी अवस्था में कुछ नाजायज झेलना अथवा देखना पड़ सकता है। सहज भाव से सही के पक्ष में सवाल उठाने या विक्षोभ जताने का फिल्वदी अवसर बनता है। जुल्म के शिकार दिखने लगते हैं, अत्याचार सहन करते दहशतज़दा लोग भी इनमें जीने का लोभ और अपनों के जीवन का मोह इनकों मौत से डराता है। अनुभव से जानते हैं कि जो पैदा हुआ उसकों मरना ही है। अगले क्षण भी मर सकना संभव है। फिर मरे जाने से क्यों डरा जाये, जीवन की रक्षा के लिए अपमान करने पर आमादा जानी दुशमन को दंड देना जरूरत होती है। अथवा जाबिर से बदला लेने के लिए उससे लड़ते हुये मारा जाने में जीवन की सार्थकता है। परन्तु जहन में बैठा यह दिया गया है कि हालिया नहीं प्रारब्ध-कर्मो के दंड स्वरूप हम पर अत्याचार होना ही हमारी नियति है। रहस्यभरी अज्ञानता का आत्याचार होना ही हमारी नियति है। रहस्यभरी अज्ञानता को आलम यह है कि हमारी कमाई से ही भारी वेतन पानेवाली राजसत्ता के भ्रष्ट अधिकारी-कर्मचारी यानि तथाकथित जन सेवकों का आतंक हम पर तारी है। कानूनी पेचीदगिों के तहत इनसे मिलीभगत रखनेवाले राजनेता और पूंजीपति हमारा शोषण करते हुये हमकों बेचारा-लाचार बनाये हुये हैं। इन सबके पालतू गुंडे,बादमाश और आपराधी कानून से परे जाकर इनके लिए हम पर दहशत बैठाये हैं। भ्रष्ट शासन-प्रशासन राजनीतिक पूंजीशाही आदि के दौर में जब जनता और श्रम को गुलाम बनाकर लूटा जा रहा हो तब शासकों-शोषकों में कौन लूटे व कितने क्षेत्र को लूटे सवालों पर गैंगवार द्वारा बाजार बांट पर दहशतगर्दी को आलम छा जाता है। बाजार बांट के लिए छद्म युद्ध चलता है। इसको साम्प्रदायिक, जात-पात परस्ती, भाषाई, क्षेत्रीय आदि में से कोई भी आधार दिया जा सकता है। बम्ब-ब्लास्ट रंगदारी रूपी चन्दा वसूली, आगज़नी, निष्कासन-विस्थापन, अपहरण वगैरह का डर लोगों में भरता है। इन पर नियंत्रण के बहाने राजसत्ता भी मजबूती के साथ अवाम को संस्थागत और व्यक्तिगत स्तर पर खूब लूटती है। युनीफार्मधारी बल तो लूट, रेप और एन्काउण्टर करने का गोया लाइसेंस ही ले लेते हैं। ऐसे में आतंकवादी क्रांतिकारी संगठन जनता की आवश्यकता बन उभरते हैं। 
        आतंकवाद का जन्म अन्याय-अत्याचार पूर्ण उपर्युक्त शासन-शोषण को माहोल मे विश्व मानव-बंधुतव की पीड़ा को लेकर हर जोर-जुल्म को नेस्तोनाबूद करने को तत्पर आदर्श चरित्र वाले बलिदानी नौजवानों के ग्रुपों में होता है। आतंकवाद की कोख से ही व्यक्ति द्वारा व्यक्ति तथा एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र को शोषण और शासन से मुक्त कर जीवन्त शांतिदायिनी वैज्ञानिक समाजवादी क्रांति जन्मती है। आतंकवादी जत्था जहां भी सक्रिय होता है वहां बलात्कारर-लूटमार समाप्त होते हैं। ये जनता की खुली अदालत में करार दिये सिद्ध दुष्टों को दुनिया-रंगमंच से हटाने की जिम्मेंदारी को अमली रूप देते हैं। फिर तो ज्ञान और अभय प्राप्त जन उभाड़ ही सबकुछ संभाल लेता है। विकल्प व्यवस्था कायम कर लेता है। विश्व इतिहास गवाह है कि मानव प्रेम से सराबोर आतंकवादी किसी निर्दोष का खून बहाने में रस नहीं लेते। यें तो जनता द्वारा निर्णीत दुष्टों का सफाया करने की जिम्मेदारी उठाते हैं। मानवतावादी विचार-चिन्तन और सच्चाई-त्याग का इनका चरित्र ही इनकी शक्ति होता है। जहां यें होते हैं सभी कदाचारी क्षेत्र छोड़ जाते हैं। प्रभावी पंचशीलता के लिए सशस्त्र होना अनिवार्यता है। सशक्तिकरण ही शांति सम्बंधों की शर्त है। पाक-भारत उदाहरण है।
      हाँ ! खेद का विषय है कि बुद्धिजीवी दहशतगर्द-आतंकियों को आतंकवादी प्रचारित कर रहे हैं। वार’ शब्द का यह दुरूपयोग है। टैरेराइजर और टैरेरिस्ट में भेद है। आतंकी व्यक्गित विलासिता के लिए वसूली करते हैं। आतंकवादी संगठन तो बाकायदा अपने आय-व्यय करते हैं। आतंकवादी संगठन तो बाकायदा अपने आय को विवरण कमेटी में प्रस्तुत करते और जवाबदेह होते हैं। भ्रष्टाचार-रिश्वतखोरी यहां नहीं चलती। ये जनता को हथियारबंद करते हैं। भ्रष्ट शासक-शोषक हथियारबन्द जनता से डरते हैं। महज आदमी मारने और प्रताड़ना करने में दक्ष भाड़े की सेना इनके पास नहीं होती। आतंकवाद जनगण को सारी शक्ति और व्यवस्था पाने में सक्षम बनानेवाली विचारधारा है। आतंककारियों, आतंकियों, दहशतगर्दो, लुटेरों, शोषकों, भ्रष्टाचारियों, पैरासाईटों अंधता की जकड़बन्दी के प्रसारकों-प्रचारकों, पूजीपतियों, पूंजी की औलादों आदि को आतंकवादी कहने का गुनाह न करें। देश-विदेश के सभी मानवतावादी आतंकवादियों को नमन। विष्णु फड़के से आजाद सब हमारे श्रध्येय बलिदानी है।