मेरा यह लेख 'सजग समाचार' के ०३-०९ अगस्त, २००९ के अंक में प्रकाशित हुआ था. आर.टी.आई और जुडीशियरी के सम्बन्ध में लिखा गया यह लेख इस बात पर आधारित है कि न्यायपालिका को आखिर आर.टी.आई के अंतर्गत आकर अपने संपत्ति का ब्यौरा देने में क्या तकलीफ है ? आर.टी.आई लोकतंत्र में जनता के लिए एक सशक्त औजार है भ्रष्टाचार निवारण के लिया वहीँ न्यायपालिका लोकतंत्र का एक प्रतिष्ठित स्तम्भ है. ऐसे में सूचना के अधिकार के तहत अपनी संपत्ति का ब्यौरा सार्वजानिक करने के लिए न्यायपालिका को सर्वप्रथम आगे आना चाहिए.
Monday, 3 August 2009
Monday, 20 July 2009
अस्पताल का निजीकरण, जनता से धोखा !!
Stop Privatization of Government Hospital.
मेरा यह लेख 'सजग समाचार' के २०-२६ जुलाई, २००९ के अंक में प्रकाशित हुआ था. यह लेख सरकारी निधि से बनाये गए राजीव गाँधी सुपर स्पेसिअलिटी अस्पताल के निजीकरण को प्रकाश में लाने के मकसद से प्रकाशित किया गया था. 650 बैड के इस अस्पताल में सरकार ने जनता के कई सौ करोड़ रुपए और 100 एकड़ ज़मीन लगाने के बाद इसके निजीकरण का ऐलान कर दिया था.
Monday, 23 March 2009
Wednesday, 28 January 2009
शिक्षा का व्यवसायीकरण है मूल मुद्दा !
Fee Hikes : ‘Result of Privatized Education’
प्राइवेट स्कूलों द्वारा बढ़ाई गई फीस पिछले कुछ दिनों से विरोध् का अहम कारण बनी हुई है। प्राइवेट स्कूलों द्वारा बढ़ाई गई फीस का आधर स्कूल मेनेजमेंट्स छठे वेतन आयोग द्वारा बढ़ाए गए वेतन से पडने वाला आर्थिक अध्भिार बता रहे हैं। स्कूल मेनेजमेंट्स की एसोसियेशन का कहना है कि छठे वेतन आयोग द्वारा प्रस्तावित वेतन के कारण उन्हें शिक्षिकों,क्लैरिकल स्टाफ और सफाई व सुरक्षा में कार्यरत कर्मचारियों को बढ़े वेतन देना उनकी कानूनी बाध्यता है। वेतन वृद्धि के कारण स्कूलों पर पड़ने वाले आर्थिक अधिभार को पूरा करने के लिए फीस वृद्धि के अलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं है इसलिए उन्हें फीस बढ़ानी ही होगी।
दूसरी तरफ, प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाले छात्र/छात्राओं के अभिभावक बढ़ी हुई फीस को अपनी आर्थिक क्षमता से कहीं ज्यादा मानते हैं। अभिभावक संघ का कहना है कि फीस वृद्धि से बढ़ने वाला खर्च झेलना उनकी आर्थिक कूबत से बाहर है। यही वजह है कि अभिभावक बढ़ी हुई फीस का विरोध् कर रहे हैं। दिल्ली में विधनसभा चुनाव के दौरान् फीस वृद्धि का मामला चुनावी राजनीति की वजह से ज्यादा चर्चा में आया। दिल्ली सरकार ने फीस वृद्धि का रेट तय करने के लिए एक कमेटी का भी गठन किया था जिसने स्कूलों की ग्रेडिंग करके फीस वृद्धि के प्रस्तावित रेट सरकार को सुझाए। लेकिन प्राईवेट स्कूलों के मेनेजमेंट्स की एसोसियेशन ने प्रस्तावित दरों कों कम बताया। अनेक स्कूलों ने सरकार के आदेशों का उल्लघन करते हुए अपनी मर्जी से फीस बढ़ाई और फीस जमा करने के लिए छात्रों पर दबाव डालना शुरू किया। मन मर्जी से की गई फीस वृद्धि का अभिभावकों ने विरोध् किया। कई स्कूलों में तालाबन्दी की भी नौबत आई और सड़कों पर जाम और प्रदर्शन भी हुए। विरोध् बढ़ते हुए नौएडा, ग्रेटर नौएडा जैसी जगहों तक भी पहुंचा। चुनावी माहौल में अभिभावकों को खुश करने के लिए राजनीतिक पार्टियां अपने-2 चुनावी लाभ-हानि के नजरिए से फीस वृद्धि के मुद्दे पर जनता को उलझाए रही। जबकि इस पूरी समस्या की जड़ शिक्षा का निजीकरण हैं। लेकिन कोई भी राजनीतिक पार्टी शिक्षा के निजीकरण का विरोध् नहीं कर रही है। विरोध् का दायरा केवल फीस की दरों तक सीमित है। बीजेपी ने विरोध् में चुनावी नजरिए से काफी बढ़-चढ़कर भाग लिया। कांग्रेस नेता श्री सज्जन कुमार ने भाजपा पर आरोप लगाया था कि भाजपा फीस वृद्धि के मामले में राजनीतिक लाभ की गरज से इस मुद्दे को राजनीतिक रंग दे रही हैं। फीस वृद्धि के मामले में भाजपा का कहना है कि वेतन बढ़ने के कारण स्कूलों पर पड़े अधिभार को सरकार को वहन करना चाहिए। ताकि अभिभावकों को यह आर्थिक भार न झेलना पड़े। लेकिन इसे भाजपा का कुतर्क कहना ही ज्यादा बेहतर होगा क्योंकि प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों का स्कूल चुनने का फैसला उनका अपना है। पब्लिक फंड से इसकी पूर्ति क्यों की जानी चाहिए? सरकारी स्कूलों में बेहतर सुविधाएँ उपलब्ध् कराना और सबकों समान शिक्षा के लिए पब्लिक फंड का इस्तेमाल करना वाजिब बात है लेकिन एक ऐसे तबके के बच्चे जो सरकारी स्कूलों में जाना अपनी हिमाकत समझते हैं उन्हें पब्लिक फंड से मदद क्यों दी जानी चाहिए?
वास्तव में फीस वृद्धि के विरोध् के साथ जुड़े सारे तर्क सबकों समान शिक्षा के अवसर उपलब्ध् कराने के संवैधनिक मौलिक अधिकार और समान नागरिक संहिता की मूलभूत संवैधनिक भावना पर केन्द्रित होने की बजाय इस सवाल पर ही मौन रखे हुए हैं। इसी वजह से यह आंदोलन कोई तार्किक आधर नहीं रखता है। सभी जानते हैं कि प्राइवेट स्कूल विशुद्ध रूप से व्यवसायिक ईकाइयां है। इनका मुख्य मकसद लाभ आर्जित करना है। लाभ अर्जित करने के लिए इन स्कूलों द्वारा वे सारे हथकड़े अपनाए जाना बिल्कुल संभव है जो अन्य औद्योगिक इकाईयां अपनाती है। फीस वृद्धि भी इन्हीं हथकडों में से एक है। प्राइवेट स्कूलों द्वारा गरीब बच्चों को शिक्षा देने के नाम पर सस्ती और रियायती दरों पर सरकार से भूमि लेना, बच्चों के मानसिक विकास कराने के नाम पर पर्यटन हेतु अनाप-शनाप पैसे वसूलना,बच्चों को स्कूल से मंहगी ड्रेस लेने के लिए बाध्य करना,स्कूलों में मंहगी किताबें और कॉपियां लेने के लिए बाध्य करना, स्वास्थ की जांच के नाम पर पैसे वसूलना आदि आम बातें हैं। कुछ स्कूलों में दाखिले के समय बिल्डिंग फीस के नाम पर तथा कुछ नामी-ग्रामी स्कूलों में प्रवेश के लिए मोटी रकम डोनेशन के नाम पर वसूल की जाती है। इसलिए केवल फीस वृद्धि का विरोध् करना या सरकार के दखल से फीस की दरें समायोजित कर लेना समस्या का निदान नहीं है। बल्कि मूल समस्या पर पर्दा डालना है। मसलन,ज्यादातर राजनीतिक पार्टियों के नेताओं के अपने प्राइवेट स्कूल हैं। लोगों को चाहिए कि शिक्षा के निजीकरण का विरोध् करें। तभी शिक्षा से सम्बंधित समस्याएं हल हो सकती है। सबकों समान शिक्षा की व्यवस्था ही मूल मुद्दा होना चाहिए।(राष्ट्रीय हिंदी दैनिक - सजग समाचार में प्रकाशित)
Monday, 19 January 2009
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